10 मार्च 2014

भाग्य और कर्म

भाग्य और कर्म आप हम अक्सर भाग्य और कर्म के चक्कर में पड़ कर भटक जाते हैं ,दरअसल हम नहीं जानते कि भाग्य और कर्म एक दुसरे के सम्पूरक शब्द हैं !मनुष्य के जन्म के समय  आकाश में ग्रहों की जो स्थिति होती है वह मनुष्य के  कर्म को पूर्ण रूप से प्रभावित करती है !कर्मों का परिणाम ही भाग्य कहलाता है किन्तु अज्ञान के कारन हम नसीब या भाग्य के फेर में अपना समय बर्बाद करते रहते हैं !भाग्य को जानने का एक माध्यम जन्म कुण्डली भी है !आइये जानें जन्म कुण्डली क्या है !
 जन्म कुण्डली क्या है   
 बारह राशियों एवं नव ग्रहों से बारह खानो का जो चक्र बनता है वही जन्मकुंडली कहलाता है !इस चक्र का पहला खाना लग्न भाव होता है ,इस खाने से ब्यक्ति कई शारीरिक स्थिति जैसे -रंग,रूप,ऊंचाई मोटाई, आदि का विचार किया जाता है !दूसरे खाने से धन,वाणी एवं आँख का !तीसरे खाने से बल एवं साहस का!चौथे खाने से मन,माता,मकान एवं वाहन ,पांचवे से शिक्षा ,बुद्धि एवं संतान का छठवे खाने से शत्रु,रोग,बाधा  आदि का विचार किया जाता है!इसी आठवें खाने से आयु ,नवें से भाग्य ,दसवें से रोजी-रोजगार ,ग्यारहवें से आमदनी तथा बारहवें खाने से ब्यय एवं हानि का विचार किया जाता है!इन बारह खानो  नव ग्रह स्थापित होते है !किसी खाने में एक से अधिक ग्रह भी बैठ सकते है किन्तु  जरूरी नहीं है कि सभी खाने में ग्रह हो कोई खाने खाली भी रह सकते हैं !किसी भी खाने में उस राशि का स्वामी ग्रह बैठा हो तो उस खाने के लिए अच्छा माना जाता है !जिस खाने में 1 अंक लिखा हो तो इसका मतलब "मेष राशि " है!  इसका स्वामी "मंगल है !सभी बारह  अंको कि राशि एवं उनका स्वामी इस प्रकार है :-jkm 

 1                मेष            मंगल
 2                वृषभ          शुक्र
 3                मिथुन        बुध  
 4                कर्क            चन्द्र
 5                 सिंह           सूर्य
 6                 कन्या         बुध
 7                 तुला          शुक्र
 8                 वृश्चिक      मंगल
 9                 धनु           गुरु             
10                मकर        शनि                                         
11                कुम्भ        शनि
12                मीन          गुरू 




 






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